बुधवार, 8 मार्च 2023

लीजेंड - ओपरा विन्फ्रे

गरीबी ऐसी कि आलू रखने के बोरे पहनकर और फेंका हुआ खाना खाकर बीता बचपन।

आज हैं 17950 करोड़ की मालकिन व दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक।


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सीख: जिंदगी में मुश्किलें कितनी ही बड़ी क्यों ना हो, फिर भी सफलता हासिल की जा सकती है। जीवन में खुद को साबित करने के अवसर मुश्किल से मिलते हैं इसलिए अवसर को लपक कर स्वयं को साबित करो।

"ओफ्रा विनफ्रे शो" - अपने समय का सबसे लोकप्रिय टीवी प्रोग्राम।

बदहाल बचपन :

ओफ्रा विनफ्रे का जन्म 29 जनवरी 1954 को अमेरिका के मिसिसिपी में हुआ। 'वर्णिता ली' जो उनकी मां थी, ने बहुत ही कम उम्र में ओपरा को जन्म दिया। तब उनकी मां कुंवारी थी। "बुक ऑफ रूथ" नामक किताब से उनका नाम 'ओरपा' रखा गया परंतु लोग उसे 'ओपरा' बुलाने लगे। जब तक आर्थिक स्थिति ठीक थी तब तक मां ने ओपरा का पालन पोषण किया। घर के हालात बिगड़ने लगे तो मां ने ओपरा को नानी के घर छोड़ दिया। नानी की आर्थिक स्थिति भी खराब थी। नानी के घर पर तन ढकने के लिए ओपरा को आलू के बोरे पहनने पड़ते थे। हालात ये थे कि ओपरा को गली-गली घूमकर लोगों का फेंका हुआ खाना खाना पड़ता था। जब कहीं से भी कुछ खाने को नहीं मिलता तो उन्होंने चोरी भी की। नानी की तबीयत खराब होने पर ओपरा मां के घर चली गई।

ओपरा की मां दूसरों के घर पर नौकरानी का काम करके अपना पेट पालती थी इसलिए वह अधिकतर समय घर से बाहर रहती थी। वह घर पर अकेली, जो उन्हें बहुत खटकता था। अकेली होने के कारण कई बार उनका यौन शोषण हुआ। 13 साल की उम्र में ओपरा पूरी तरह से टूट चुकी थी। अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में किसी को बता भी नहीं पाई। आखिरकार एक दिन घर छोड़कर भाग गई। घर से भागते समय वह प्रेग्नेंट थी। प्रेग्नेंसी के समय उम्र कम होने के कारण उसका बच्चा बच नहीं सका। जल्दी ही मां ने ओपरा को ढूंढ लिया और घर वापस ले आई। मां के पास थोड़े से रुपए इकट्ठे हो गए थे। अतः मां ने ओपरा का एडमिशन स्कूल में करवा दिया। वहां अमीरों के बच्चे भी पढ़ते थे। ओपरा उनकी तरह बनने के प्रयास में घर से पैसे चुरा लेती थी। इससे उनकी मां परेशान हो जाती थी। इससे तंग आकर उन्होंने ओपरा को उसके सौतेले पिता के पास भेज दिया। इस निर्णय ने ओपरा की लाइफ बदल दी।

जिंदगी बदल गई:

ओपरा के सौतेले पिता अच्छे इंसान थे। उन्होंने ओपरा का स्कूल में एडमिशन कराया। लापरवाह ओपरा को अनुशासन सिखाया। यहां से उनके जीवन में सुखद परिवर्तन आने लगा। ओपरा ने पढ़ाई के मौके का भरपूर लाभ उठाया और सबको पीछे छोड़ दिया। पब्लिक स्पीकिंग और ड्रामा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उनकी शानदार आवाज और प्रतिभा को देखकर लोकल रेडियो स्टेशन ने उन्हें न्यूज़ पढ़ने का अवसर दिया। स्कॉलरशिप के बलबूते उन्होंने स्पीच कम्युनिकेशन की पढ़ाई टेनेस स्टेट यूनिवर्सिटी की। पढ़ाई के दौरान ही मशहूर न्यूज़ चैनल में उनकी जॉब लग गई। नौकरी के लिए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें जॉब से निकाल दिया गया। साल 1986 में उनके जीवन में नया मोड़ आया। उन्होंने इस समय "ओप्रा विनफ्रे शो" शुरू किया। महिला समस्या से शुरू हुआ यह शो राजनीति, स्वास्थ्य, अध्यात्म और विवादित मुद्दों पर चर्चा का केंद्र बन गया। यह शो इतना लोकप्रिय हुआ कि शो का समय बढ़ाना पड़ा। ओपरा का यह शो 20 साल से ज्यादा चला। 24 सीजन के 5000 से ज्यादा एपिसोड टेलीकास्ट हुए। इतनी गरीबी और बदहाली का जीवन जीने वाले ओपरा आज सबसे ज्यादा पैसे कमाने वाली टीवी एक्ट्रेस हैं। सोचिए - "यह कर सकती है तो आप क्यों नहीं कर सकते? क्या चाहिए? जोश, जुनून, समर्पण, कुछ कर गुजरने का जज्बा बस! कुछ करने की ठान ले तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।"


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मंगलवार, 7 मार्च 2023

निक वुईचिक: Nothing is impossible

 

                                                                                                                  Image Credit: Original Owner

जब हमारे सामने कोई विपत्ति आती है तो हम घबरा जाते हैं। हार मान लेते हैं। ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है? ऐसे नकारात्मक विचारों से हम घिर जाते हैं। लेकिन आज हम ऐसी शख्सियत से आपका परिचय करवा रहे हैं जो पैदा ही अभावों के साथ हुआ लेकिन आज सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर, मेंटॉर है.....जिनका नाम है निक वुईचिक। 

निक का जब जन्म हुआ तो नर्स ने मां को बच्चा सौंपा तब मां बच्चे को देखकर घबरा गई और बच्चे को लेने से इनकार कर दिया। क्योंकि बच्चे के न तो दोनों हाथ थे और ना ही दोनों पैर। नॉर्मल होने के बाद मां ने बच्चे को स्वीकार किया। 4 दिसंबर,1982 को  मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया में जन्मे निक के इन विकारों को सुधारने में कई डॉक्टर असफल रहे।आज भी निक बिना हाथ पैरों के अपना जीवन सफलतापूर्वक जी रहे हैं। 

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जीवन संघर्ष

उनके माता-पिता उन्हें हर तरह से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे इसलिए निक को स्पेशल स्कूल में भर्ती करवाने से मना कर दिया और सामान्य स्कूल में भर्ती करवाया। इसका फायदा यह हुआ कि वे सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने लगे। बचपन में ही उसे तैरना सिखाने लगे। मात्र 6 साल की अवस्था में पंजे की सहायता से टाइपिंग सिखाने लगे। प्लास्टिक की एक ऐसी डिवाइस बनवाई जिसकी सहायता से पेन पेंसिल पकड़कर लिखना सीख सकें।

आत्महत्या की कोशिश :

निक का जीवन काफी संघर्षपूर्ण था। हम अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस व्यक्ति के हाथ-पैर दोनों नहीं हो, उसका जीवन कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा। स्कूली जीवन में उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बच्चे उनका मजाक उड़ाया करते थे। साथियों के साथ वे खेल भी नहीं पाते थे। इन सब मुसीबतों के चलते निराश होकर उन्होंने आत्महत्या करने की सोची और एक पानी से भरे टब में जाकर  कूद गए। समय रहते उन्हें बचा लिया गया।

जीवन की दिशा बदल गई:


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जब निक की उम्र तेरह साल थी तो एक दिन उनकी माँ ने अख़बार में प्रकाशित एक लेख निक को पढ़कर सुनाया जिसमें एक विकलांग व्यक्ति के जीवन संघर्ष और सफलता की कहानी थी। निक को अहसास हुआ कि दुनिया में वह अकेला विकलांग व्यक्ति नहीं है और मेहनत व संघर्ष के रास्ते आगे बढ़ा जा सकता है। उसके बाद उसके जीवन की दिशा ही बदल गई। उसे महसूस हुआ कि ईश्वर ने उसे कुछ विशेष करने के लिए ही ऐसी स्थिति में डाला है। उसे तो स्वयं प्रेरणा व प्रोत्साहन की ज़रूरत थी लेकिन उसने संकल्प लिया कि वह स्वयं लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करेगा जिससे लोगों में व्याप्त निराशा व अकर्मण्यता दूर हो सके और वे उत्साहपूर्वक कार्य करते हुए अच्छी तरह से जीवन व्यतीत कर उसका आनंद ले सकें ।

निक को हमेशा आश्चर्य होता था की वे दूसरो से अलग क्यों है? वे बार-बार अपने जीवन के मकसद को लेकर प्रश्न पूछा करते थे। उनका कोई उद्देश्य है या नही ,ये प्रश्न भी अक्सर उन्हें परेशान करते थे।

निक कहते हैं - "आज उनकी ताकत और उनकी उपलब्धियों का पूरा श्रेय भगवान पर बने उनके अटूट विश्वास और श्रद्धा को जाता है। अपने अब तक के जीवन में जिनसे भी मिले फिर चाहे वह फ्रेंड हो, रिश्तेदार हो या सहकर्मी हो, उन सभी ने उन्हें काफी प्रेरित किया है।"

करियर:

19 साल की आयु में अपने पहले भाषण से लेकर अब तक निक पूरे विश्व की यात्रा कर रहे है और अपनी प्रेरणादायी घटनाओ से लोगो को प्रेरित कर रहे है।विश्व भर में आज निक के करोड़ों अनुयायी है, जो उन्हें देखकर प्रेरित होते है। आज युवावस्था में भी उन्होंने बहुत से पुरस्कार हासिल किये है। आज वे एक ऑथर, म्यूजिशियन, एक्टर है। साथ ही उनको फिशिंग, पेंटिंग और स्विमिंग में भी काफी इंटरेस्ट है। उन्होंने एटिट्यूड इज़ एल्टिट्यूड नामक कंपनी की स्थापना की । बतौर एक्टर शॉर्ट फिल्म The Butterfly Circus में काम किया।

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9 मार्च 2002 में, वह कैलिफोर्निया चले गए। 2008 में मैक्किनी, टेक्सास में उनकी मुलाकात कानाए मियाहारा से हुई। उन्होंने 12 फरवरी 2012 को उनसे शादी कर ली । निक और कानाए के चार बच्चे हैं। और दक्षिणी कैलिफोर्निया में रहते हैं।

निक जिन्होंने फिर से साबित कर दिया की इस दुनिया में  इंपोसिबल कुछ भी नहीं है। उन्होंने सिद्ध कर दिया की वो जब बिना हाथ पैर के इतना कामयाब हो सकते है। तो आप क्यों नहीं हो सकते। निक अब लोगो को मोटिवेट करते है। एक बार तो उनकी मोटिवेशनल बातें सुनने के लिए  इतने अधिक लोग (एक लाख से ऊपर) इकठ्ठा हो गए थे कि लोगों के बैठने तक की जगह नहीं थी ।

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रविवार, 5 मार्च 2023

अद्भुत शख्सियत-जैसन आर्डे

 

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कहा जाता है कि हौसला बुलंद हो तो कुछ भी असंभव नहीं। इन्हीं जोशीले विचारों को हूबहू जीवन में उतारने वाले सबसे कम उम्र के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं जैसन आर्डे। "ऑटिज्म डिसऑर्डर" नामक बीमारी के कारण जो शख्स 18 साल की उम्र तक पढ़ना लिखना नहीं जानता हो,वह अब कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गया है। उनकी सफलता की कहानी जान कर हर कोई हैरान है। अगर दुनिया की टॉप यूनिवर्सिटी में कोई प्रोफेसर है तो हम यही कहेंगे कि वह पढ़ने में बहुत तेज होंगे। अच्छी स्कूल में पढ़े होंगे। पर हम आज ऐसे शख्स के बारे में बात कर रहे हैं जो 18 साल की उम्र तक कलम चलाना भी नहीं जानते थे। पढ़ाई लिखाई तो दूर की बात है। उम्र के अनुसार शारीरिक विकास नहीं कर पाने के कारण 11 साल की उम्र तक वे बोल नहीं पाते थे। मन में कुछ बड़ा करने का जज्बा और संघर्ष करने का पक्का इरादा लेकर सारी बाधाओं को पार करते हुए लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए। यह कोई मूवी की स्टोरी नहीं बल्कि ब्रिटेन में रहने वाले जैसन आर्डे की हकीकत है, जो आपको प्रेरणा से भर देगी। 

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37 साल के जैसन आर्डे को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही वह कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर बन गए हैं। उनके जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आए। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम लंदन के क्लैफेम में पैदा हुए और पले-बढ़े जेसन आर्डे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर नामक बीमारी से पीड़ित थे, जिसकी वजह से शुरुआत में उनका सही से शारीरिक विकास भी नहीं हो पाया। उनके परिवार को बताया गया था कि आर्डे को जीवनभर सहारे की जरूरत होगी। पर 37 वर्षीय जेसन ने बुलंद हौसले के साथ सभी बाधाओं को पार कर दिखाया।

दीवारों पर अपने टारगेट लिखा करते थे

जैसन ने बताया कि  8 साल पहले उन्हें कहा गया कि उन्हें एक फैसेलिटीज में रहना होगा। उन्होंने  ऐसा करने से मना कर दिया। इतनी परेशान‍ियां भी उनके हौसले को डिगा नहीं पाईं। जेसन आर्डे अपनी मां के बेडरूम की दीवारों पर अपने टारगेट को हमेशा लिखा करते थे। वह वहां लिखा करते थे कि वह ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज में काम करना चाहते हैं। उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में मां की अहम भूमिका रही है। मेंटर और दोस्त सैंड्रो सैंड्री की मदद से आर्डे ने किशोरावस्था में पढ़ना- लिखना शुरू किया।इसके बाद अदम्य साहस के बल पर सरे विश्वविद्यालय से फिजिकल एजुकेशन और एजुकेशन स्टडीज में डिग्री हासिल की और पीई टीचर बन गए. बाद में उन्‍होंने एजुकेशन स्टडीज में दो मास्टर डिग्री और पीएचडी भी की। सबसे कम उम्र के प्रोफेसरों में से एक जेसन आर्डे ने वर्ष 2018 में अपना पहला रिसर्च पेपर प्रकाशित किया । बाद में वह दरहम विश्वविद्यालय में सोशियोलॉजी सामजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। वह साल 2021 में ब्रिटेन में सबसे कम उम्र के प्रोफेसरों में से एक बने। बेघर परिवारों के लिए 2010 में उन्होने 35 दिनों में 30 मैराथन दौड़ लगाई। 2020 तक आर्डे ने 70अलग-अलग चैरिटी संस्थाओ के लिए 4.5 मिलियन यूरो जुटा लिए थे। उनका ये सफ़र उपलब्‍ध‍ियों से भरा हुआ है। जेसन आर्डे ने कहा, भले ही मैं बहुत ज्यादा आशावादी हूं, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। अगर मैं शर्त लगाने वाला आदमी होता तो ऐसा होने की संभावना बहुत कम थी। ये सच में हैरान कर देने वाला है।

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शनिवार, 4 मार्च 2023

ब्लैक पर्ल

 जीवन की संघर्षपूर्ण शुरुआत -



अमेरिका के टेनेसी प्रांत में 23 जून 1940 को ब्लैंच रूडोल्फ ने एक प्रीमेच्योर बेबी को जन्म दिया। उसका वजन मात्र 2 किलो था जो सामान्य से कम था। इसके पिता ने दो शादियां की थी। यह अपने पिता की कुल 22 संतानों में 20 वीं थी। इसके पिता कुली का काम करते थे और उसकी मां दूसरों के घरों में नौकरानी का। अश्वेत होने के कारण अमेरिका में इनके परिवार को दोयम दर्जे का समझा जाता था। 4 वर्ष की आयु में इसके पैरों में असहनीय दर्द उठा। डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि इसे तो पोलियो हो गया और यह कभी अपने पैरों से नहीं चल पाएगी। इसकी मां को झटका लगा लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। आज हम बात कर रहे हैं उस लड़की की जो बेहद गरीबी और शारीरिक कमजोरियों से संघर्ष करते हुए अपने दृढ़ इच्छाशक्ति और जज्बे की बदौलत ओलंपिक चैंपियन बनकर अमेरिका के ओलंपिक इतिहास में अमर हो गई। नाम है - विल्मा रूडोल्फ। अश्वेत  होने का दर्द क्या होता है, यह विल्मा ही जानती थी।

पोलियो से लड़ी -



पोलियो ग्रस्त होने पर सामान्य अस्पतालों में उसका इलाज नहीं हुआ। 50 मील दूर जहां अश्वेतों का इलाज होता था , वहां विल्मा को जाना पड़ा। 5 साल तक लगातार इलाज हुआ तो विल्मा की हालत में कुछ सुधार हुआ। वह कैलिपर्स के सहारे चलने लगी। डॉक्टरों ने विल्मा की मां को बताया कि वह कभी बिना सहारे के चल नहीं पाएगी। उसकी मां ने फिर भी हार नहीं मानी। विल्मा को हौसला दिया - "यदि किसी काम को पूरी लगन और जज्बे से किया जाए तो बड़ी से बड़ी चट्टान भी उसके रास्ते की बाधा नहीं बन पाएगी।" विल्मा अपने आप को कमजोर ना समझे इसलिए उसको स्कूल में भर्ती करवा दिया गया। उसने बिना सहारे के चलने की बार-बार कोशिश की। गिरती ....फिर उठती। उसने दर्द को सहा। इन्हीं कोशिशों के बदौलत वह 11 वर्ष की आयु में बिना किसी सहारे के चलने लगी। उसकी मां ने डॉक्टर को जानकारी दी तो वे बहुत खुश हुए और उन्होंने भी विल्मा का हौसला बढ़ाया।

 दौड़ने में मजा आता था -

तभी विल्मा ने लाइफ चेंजिंग डिसीजन लिया - "मुझे धावक बनना है ।"और इसकी प्रैक्टिस शुरू कर दी। वर्ष 1953 में 13 वर्ष की आयु में  विल्मा ने पहली बार अंतरविद्यालय दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिया और असफल रही। उसने फिर से कोशिश की। लगातार असफल होने के बाद विल्मा ने 9वीं प्रतियोगिता में जीत हासिल की। 15 वर्ष की आयु में विल्मा का दाखिला टेनेसी राज्य विश्वविद्यालय में  करवाया गया। वहां उनकी मुलाकात कोच ऐड टेंपल से हुई। उन्होंने विल्मा की प्रतिभा को पहचाना और तराशा। उन्होंने एक दिन भी अपनी ट्रेनिंग मिस नहीं की। इसी प्रतिभा,लगन और मेहनत ने विल्मा को ओलंपिक में पहुंचा दिया।

सफ़लता का शिखर -


मात्र 16 वर्ष की आयु में 1956 के ऑस्ट्रेलिया के ओलिंपिक में 400 मीटर रिले दौड़ में गोल्ड मेडल जीता। 20 साल की उम्र में विल्मा को 1960 में रूस के ओलंपिक में दौड़ने का अवसर मिला जहां उन्होंने 100 मीटर की दौड़ में उस समय की गोल्ड मेडलिस्ट जूता हेन को हराकर स्वर्ण पदक जीता। फिर 200 मीटर व 400 मीटर में की रिले दौड़ में भी उनका मुकाबला जूता हेन से था। तीनों में उसने जूता हेन को हराया और तीन गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली अमेरिकन महिला बनी। उन्होंने अपनी सफ़लता का श्रेय अपनी जुझारू और दृढ़ संकल्प की प्रतिमा मां को दिया।
READER TODAY- LEADER TOMORROW 
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दशरथ मांझी: वह शख्स जिसने प्यार के लिए पहाड़ का सीना चीर दिया

भारत की मिट्टी में ऐसे कई हीरे छुपे हुए हैं, जिनकी चमक दुनिया देर से पहचानती है। दशरथ मांझी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है — एक गरीब मजदूर, जि...