शनिवार, 4 मार्च 2023

ब्लैक पर्ल

 जीवन की संघर्षपूर्ण शुरुआत -



अमेरिका के टेनेसी प्रांत में 23 जून 1940 को ब्लैंच रूडोल्फ ने एक प्रीमेच्योर बेबी को जन्म दिया। उसका वजन मात्र 2 किलो था जो सामान्य से कम था। इसके पिता ने दो शादियां की थी। यह अपने पिता की कुल 22 संतानों में 20 वीं थी। इसके पिता कुली का काम करते थे और उसकी मां दूसरों के घरों में नौकरानी का। अश्वेत होने के कारण अमेरिका में इनके परिवार को दोयम दर्जे का समझा जाता था। 4 वर्ष की आयु में इसके पैरों में असहनीय दर्द उठा। डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि इसे तो पोलियो हो गया और यह कभी अपने पैरों से नहीं चल पाएगी। इसकी मां को झटका लगा लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। आज हम बात कर रहे हैं उस लड़की की जो बेहद गरीबी और शारीरिक कमजोरियों से संघर्ष करते हुए अपने दृढ़ इच्छाशक्ति और जज्बे की बदौलत ओलंपिक चैंपियन बनकर अमेरिका के ओलंपिक इतिहास में अमर हो गई। नाम है - विल्मा रूडोल्फ। अश्वेत  होने का दर्द क्या होता है, यह विल्मा ही जानती थी।

पोलियो से लड़ी -



पोलियो ग्रस्त होने पर सामान्य अस्पतालों में उसका इलाज नहीं हुआ। 50 मील दूर जहां अश्वेतों का इलाज होता था , वहां विल्मा को जाना पड़ा। 5 साल तक लगातार इलाज हुआ तो विल्मा की हालत में कुछ सुधार हुआ। वह कैलिपर्स के सहारे चलने लगी। डॉक्टरों ने विल्मा की मां को बताया कि वह कभी बिना सहारे के चल नहीं पाएगी। उसकी मां ने फिर भी हार नहीं मानी। विल्मा को हौसला दिया - "यदि किसी काम को पूरी लगन और जज्बे से किया जाए तो बड़ी से बड़ी चट्टान भी उसके रास्ते की बाधा नहीं बन पाएगी।" विल्मा अपने आप को कमजोर ना समझे इसलिए उसको स्कूल में भर्ती करवा दिया गया। उसने बिना सहारे के चलने की बार-बार कोशिश की। गिरती ....फिर उठती। उसने दर्द को सहा। इन्हीं कोशिशों के बदौलत वह 11 वर्ष की आयु में बिना किसी सहारे के चलने लगी। उसकी मां ने डॉक्टर को जानकारी दी तो वे बहुत खुश हुए और उन्होंने भी विल्मा का हौसला बढ़ाया।

 दौड़ने में मजा आता था -

तभी विल्मा ने लाइफ चेंजिंग डिसीजन लिया - "मुझे धावक बनना है ।"और इसकी प्रैक्टिस शुरू कर दी। वर्ष 1953 में 13 वर्ष की आयु में  विल्मा ने पहली बार अंतरविद्यालय दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिया और असफल रही। उसने फिर से कोशिश की। लगातार असफल होने के बाद विल्मा ने 9वीं प्रतियोगिता में जीत हासिल की। 15 वर्ष की आयु में विल्मा का दाखिला टेनेसी राज्य विश्वविद्यालय में  करवाया गया। वहां उनकी मुलाकात कोच ऐड टेंपल से हुई। उन्होंने विल्मा की प्रतिभा को पहचाना और तराशा। उन्होंने एक दिन भी अपनी ट्रेनिंग मिस नहीं की। इसी प्रतिभा,लगन और मेहनत ने विल्मा को ओलंपिक में पहुंचा दिया।

सफ़लता का शिखर -


मात्र 16 वर्ष की आयु में 1956 के ऑस्ट्रेलिया के ओलिंपिक में 400 मीटर रिले दौड़ में गोल्ड मेडल जीता। 20 साल की उम्र में विल्मा को 1960 में रूस के ओलंपिक में दौड़ने का अवसर मिला जहां उन्होंने 100 मीटर की दौड़ में उस समय की गोल्ड मेडलिस्ट जूता हेन को हराकर स्वर्ण पदक जीता। फिर 200 मीटर व 400 मीटर में की रिले दौड़ में भी उनका मुकाबला जूता हेन से था। तीनों में उसने जूता हेन को हराया और तीन गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली अमेरिकन महिला बनी। उन्होंने अपनी सफ़लता का श्रेय अपनी जुझारू और दृढ़ संकल्प की प्रतिमा मां को दिया।
READER TODAY- LEADER TOMORROW 
लेख को अंत तक पढने के लिए धन्यवाद||

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