मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

राजेंद्र सिंह: 'भारत के जल पुरुष' की प्रेरणादायक कहानी | Waterman of India in Hindi


जल ही जीवन है, यह वाक्य हम सभी ने बचपन से सुना है। लेकिन जब नदियां सूख जाती हैं, कुएं बंजर हो जाते हैं और धरती की प्यास बुझाने के लिए आसमान से एक बूंद भी नहीं गिरती, तब इस वाक्य का असली अर्थ समझ में आता है। भारत के रेगिस्तानी राज्य राजस्थान ने दशकों तक इस भयानक जल संकट का सामना किया है। लेकिन एक व्यक्ति के दृढ़ संकल्प और पारंपरिक ज्ञान ने इस सूखे परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया। उस व्यक्ति का नाम है— राजेंद्र सिंह (Rajendra Singh), जिन्हें पूरी दुनिया आज 'भारत के जल पुरुष' (Waterman of India) के नाम से जानती है।

यह ब्लॉग पोस्ट उन सभी छात्रों, पर्यावरण प्रेमियों और जागरूक नागरिकों के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है, जो जल संरक्षण (Water Conservation), तरुण भारत संघ (Tarun Bharat Sangh) और राजेंद्र सिंह जी के जीवन संघर्ष और उनकी अभूतपूर्व सफलताओं के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं।


राजेंद्र सिंह कौन हैं? (Who is Rajendra Singh?)

राजेंद्र सिंह एक प्रसिद्ध भारतीय जल संरक्षणवादी और पर्यावरणविद् हैं। उनका जन्म 6 अगस्त 1959 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के डौला गांव में हुआ था। वह तरुण भारत संघ (TBS) नामक गैर-सरकारी संगठन (NGO) के संस्थापक और अध्यक्ष हैं। उन्होंने राजस्थान के सबसे सूखे और बंजर इलाकों में पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों, विशेष रूप से 'जोहड़' (Johad) के निर्माण के माध्यम से भूजल स्तर को बढ़ाने और सूखी नदियों को पुनर्जीवित करने का ऐतिहासिक कार्य किया है।

उनके अथक प्रयासों के कारण राजस्थान के अलवर और आसपास के जिलों में 1000 से अधिक गांवों में पानी वापस लौट आया है और 7 से अधिक सूखी नदियां फिर से बहने लगी हैं। उनके इस अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 'रमन मैग्सेसे पुरस्कार' (Ramon Magsaysay Award) और 'स्टॉकहोम जल पुरस्कार' (Stockholm Water Prize - जिसे जल का नोबेल भी कहा जाता है) से सम्मानित किया जा चुका है।

प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और वैचारिक प्रभाव

राजेंद्र सिंह का बचपन एक कृषि प्रधान परिवार में बीता। एक किसान परिवार से होने के कारण उन्हें बचपन से ही मिट्टी, पानी और प्रकृति के महत्व का अहसास था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय (अब चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय) से आयुर्वेदिक मेडिसिन (Ayurvedic Medicine) और सर्जरी (BAMS) में डिग्री हासिल की। इसके अलावा उन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (Post Graduation) भी किया।

युवावस्था में राजेंद्र सिंह महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण (JP) के विचारों से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने जेपी आंदोलन में भी हिस्सा लिया था, जिसने उनके अंदर समाज सेवा और ग्रामीण विकास की गहरी भावना पैदा की। 1980 में वे सरकारी सेवा में शामिल हुए और जयपुर में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के शिक्षा अधिकारी के रूप में कार्य करने लगे।

जीवन का टर्निंग पॉइंट: अलवर की वह ऐतिहासिक यात्रा

1984 का समय था। राजेंद्र सिंह अपने कुछ साथियों के साथ राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा गांव पहुंचे। उनका प्राथमिक उद्देश्य वहां के गरीब और पिछड़े ग्रामीणों को आयुर्वेदिक चिकित्सा सुविधा प्रदान करना और शिक्षा का प्रसार करना था। लेकिन वहां पहुंचने पर उन्होंने जो देखा, उसने उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

"हमें दवा नहीं, पानी चाहिए"

अलवर उस समय भयंकर सूखे की चपेट में था। कुएं सूख चुके थे, हरियाली नाम मात्र की नहीं थी, और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके थे। गांवों में केवल बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे ही बचे थे। जब राजेंद्र सिंह ने वहां एक क्लीनिक खोला, तो स्थानीय गुर्जर समुदाय के एक बुजुर्ग मांगू राम पटेल (Mangu Ram Patel) ने उनसे कहा:

"बाबूजी, हमें आपकी दवाइयों की जरूरत नहीं है। हमारी सबसे बड़ी बीमारी पानी की कमी है। अगर आप कुछ करना ही चाहते हैं, तो हमारे लिए पानी का इंतजाम कीजिए।"

मांगू राम जी ने ही राजेंद्र सिंह को पारंपरिक जल संरक्षण पद्धति 'जोहड़' (Johad) के बारे में बताया। यह बातचीत राजेंद्र सिंह के जीवन का वह मोड़ थी, जहां से एक आयुर्वेदिक डॉक्टर ने 'जल पुरुष' बनने की ओर अपना पहला कदम बढ़ाया। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और अपना पूरा जीवन जल संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया।

जोहड़ (Johad): पारंपरिक ज्ञान की वापसी


जोहड़ एक प्रकार का छोटा, कच्चा बांध या अर्धचंद्राकार मिट्टी का गड्ढा होता है, जिसे बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए ढलान वाले इलाकों में बनाया जाता है। जब बारिश होती है, तो पानी बहकर इन जोहड़ों में जमा हो जाता है। यह रुका हुआ पानी धीरे-धीरे जमीन के अंदर रिसता है (Percolation), जिससे भूजल स्तर (Groundwater level) में वृद्धि होती है और आसपास के कुओं और ट्यूबवेलों में पानी आ जाता है।

जोहड़ निर्माण की प्रक्रिया और चुनौतियां

राजेंद्र सिंह ने मांगू राम के मार्गदर्शन में अपने हाथों से कुदाल और फावड़ा उठाया और गोपालपुरा गांव में पहला जोहड़ बनाना शुरू किया। शुरुआत में गांव वालों ने उन पर ज्यादा विश्वास नहीं किया, लेकिन जब पहले ही मानसून के बाद उस जोहड़ में पानी भर गया और पास के सूखे कुओं में जलस्तर बढ़ गया, तो ग्रामीणों का नजरिया बदल गया।

इसके बाद तो एक क्रांति सी आ गई। लोग श्रमदान (Voluntary Labor) के लिए आगे आने लगे। तरुण भारत संघ (TBS) ने यह नियम बनाया कि जोहड़ बनाने का निर्णय गांव की 'ग्राम सभा' (Gram Sabha) लेगी और निर्माण की लागत का एक हिस्सा (श्रम या धन के रूप में) गांव वाले खुद उठाएंगे। इस मॉडल ने लोगों में अपनी जल संरचनाओं के प्रति 'स्वामित्व' (Ownership) की भावना पैदा की।

तरुण भारत संघ (Tarun Bharat Sangh - TBS) की भूमिका

यद्यपि तरुण भारत संघ की स्थापना 1975 में जयपुर विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा की गई थी, लेकिन राजेंद्र सिंह के जुड़ने के बाद यह संगठन जल संरक्षण का पर्याय बन गया। TBS का मुख्य काम लोगों को जागरूक करना, उन्हें एकजुट करना और पारंपरिक जल प्रबंधन विधियों को वैज्ञानिक तरीके से लागू करने में तकनीकी मदद प्रदान करना है।

  • सामुदायिक भागीदारी: TBS का मानना है कि पानी की समस्या का समाधान सरकार के दफ्तरों से नहीं, बल्कि गांव के चौपाल से निकलेगा।
  • नदी संसदों का गठन: पानी के समान वितरण और नदियों के प्रबंधन के लिए TBS ने 'अरवरी संसद' जैसी अनूठी लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत की।
  • वन्यजीव संरक्षण: जलस्तर बढ़ने से सरिस्का टाइगर रिजर्व (Sariska Tiger Reserve) के आसपास जंगलों में भी हरियाली लौटी, जिससे वन्यजीवों को नया जीवन मिला।

राजेंद्र सिंह के प्रयासों का प्रभाव: सूखी नदियों का पुनर्जन्म

राजेंद्र सिंह और उनकी टीम के प्रयासों का परिणाम किसी चमत्कार से कम नहीं था। पिछले चार दशकों में, TBS की मदद से राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में 11,000 से अधिक जोहड़, चेक डैम और एनीकट बनाए गए हैं। इसका सीधा फायदा 1,000 से ज्यादा गांवों को मिला है।

सबसे बड़ा चमत्कार सूखी नदियों का फिर से बहना था। जो नदियां दशकों पहले सूखकर नाले में तब्दील हो गई थीं, वे आज सदानीरा (Perennial) बन गई हैं। इनमें प्रमुख नदियां शामिल हैं:

नदी का नाम प्रभावित क्षेत्र / जिला वर्तमान स्थिति
अरवरी (Arvari) अलवर दशकों तक सूखी रहने के बाद 1990 में पुनर्जीवित। अब 12 महीने बहती है।
रूपारेल (Ruparel) अलवर / भरतपुर जोहड़ों के निर्माण से सरिस्का के जीवों को भी पानी मिला।
सरसा (Sarsa) अलवर सूखे क्षेत्र को सिंचाई योग्य भूमि में बदला।
भगाणी (Bhagani) अलवर पूरी तरह से पुनर्जीवित, कृषि में भारी वृद्धि।
जहाजवाली (Jahajwali) अलवर जलस्तर बढ़ने से पलायन रुके।

इन नदियों के पुनर्जीवित होने से पलायन कर चुके लोग वापस अपने गांवों में लौटने लगे। कृषि उत्पादकता कई गुना बढ़ गई और महिलाओं को पानी लाने के लिए मीलों दूर पैदल चलने के कष्ट से मुक्ति मिल गई।

संघर्ष और सरकारी बाधाएं (Challenges and Hurdles)

सामाजिक बदलाव का कोई भी रास्ता आसान नहीं होता। जब राजेंद्र सिंह ने जोहड़ बनवाना शुरू किया, तो उन्हें शुरुआत में सिंचाई विभाग (Irrigation Department) से कानूनी नोटिस मिले। सरकारी नियमों के अनुसार, नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों पर सारा अधिकार सरकार का था और कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति के बांध या जोहड़ नहीं बना सकता था।

सरकार ने उनके द्वारा बनाए गए कुछ जोहड़ों को तोड़ने की कोशिश भी की। लेकिन जब ग्राम सभाएं एकजुट हो गईं और "हमारा जल, हमारा हक" का नारा दिया, तो प्रशासन को झुकना पड़ा। यहां तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने भी अरवरी नदी के पुनर्जीवन पर ध्यान दिया और सरकार को अपनी नीतियां बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। राजेंद्र सिंह ने साबित कर दिया कि पारंपरिक ज्ञान और विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन (Decentralized Water Management) बड़े बांधों से कहीं अधिक कारगर है।

प्रमुख सम्मान और पुरस्कार (Awards and Recognition)

राजेंद्र सिंह के निःस्वार्थ काम ने न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में ध्यान आकर्षित किया। उन्हें कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है:

  • रमन मैग्सेसे पुरस्कार (Ramon Magsaysay Award - 2001): सामुदायिक नेतृत्व (Community Leadership) के लिए उन्हें एशिया का नोबेल माने जाने वाले इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • स्टॉकहोम वाटर प्राइज (Stockholm Water Prize - 2015): जल संरक्षण के क्षेत्र में यह दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है। उन्हें यह पुरस्कार उनकी नवीन जल बहाली रणनीतियों के लिए दिया गया।
  • अहिंसा पुरस्कार (Ahimsa Award - 2016): यूके के इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी द्वारा शांति और पर्यावरण संरक्षण के लिए।
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार (Jamnalal Bajaj Award - 2005): ग्रामीण विकास में उत्कृष्ट योगदान के लिए।

विश्व स्तर पर 'जल साक्षरता' अभियान


वर्तमान में, राजेंद्र सिंह केवल राजस्थान या भारत तक सीमित नहीं हैं। वे एक वैश्विक मंच पर जल साक्षरता (Water Literacy) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के खिलाफ लड़ रहे हैं। उन्होंने 'विश्व जल शांति यात्रा' (World Water Peace Walk) की शुरुआत की है, जिसके तहत वे दुनिया भर के देशों में जाकर सरकारों और आम लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करते हैं।

उनका स्पष्ट मानना है कि अगर तीसरा विश्व युद्ध कभी हुआ, तो वह पानी के लिए ही होगा। इसलिए, हमें जल के व्यावसायीकरण (Privatization of Water) को रोकना होगा और जल को एक प्राकृतिक अधिकार (Natural Right) मानना होगा।

हम 'भारत के जल पुरुष' से क्या सीख सकते हैं?

राजेंद्र सिंह जी का जीवन हमारे लिए एक खुली किताब है। एक आम व्यक्ति के रूप में हम उनके जीवन से कई महत्वपूर्ण सबक ले सकते हैं:

  1. पारंपरिक ज्ञान का सम्मान: आधुनिक तकनीक महत्वपूर्ण है, लेकिन हमारे पूर्वजों का पारंपरिक ज्ञान पर्यावरण के अनुकूल और दीर्घकालिक (Sustainable) है।
  2. समुदाय की ताकत: जब समाज का हर व्यक्ति किसी समस्या के समाधान के लिए एक साथ खड़ा होता है, तो बड़े से बड़ा संकट भी टाला जा सकता है।
  3. जल का विवेकपूर्ण उपयोग: हमें अपने घरों में पानी की बर्बादी रोकनी चाहिए। रेन वाटर हार्वेस्टिंग (Rainwater Harvesting) को हर घर का हिस्सा बनाना चाहिए।
  4. दृढ़ इच्छाशक्ति: एक व्यक्ति पूरे परिदृश्य को बदल सकता है, बशर्ते उसकी नीयत साफ हो और इरादे मजबूत हों।

निष्कर्ष (Conclusion)

राजेंद्र सिंह, 'भारत के जल पुरुष', इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि यदि मनुष्य प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चले, तो वह मरुस्थल में भी नदियां बहा सकता है। अलवर के सूखे और वीरान गांवों से लेकर स्टॉकहोम के अंतरराष्ट्रीय मंच तक, उनकी यात्रा 'संकल्प से सिद्धि' की एक अद्भुत मिसाल है।

आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, भूजल की कमी और भयंकर सूखे के मुहाने पर खड़ी है, तब राजेंद्र सिंह का जोहड़ मॉडल पूरी मानवता के लिए एक संजीवनी बूटी के समान है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके 'जल साक्षरता' अभियान का हिस्सा बनें और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की हर एक बूंद को सहेज कर रखें।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. भारत का जल पुरुष (Waterman of India) किसे कहा जाता है?
Ans. राजेंद्र सिंह को उनके जल संरक्षण के असाधारण कार्यों के लिए 'भारत का जल पुरुष' कहा जाता है।

Q2. तरुण भारत संघ (Tarun Bharat Sangh) का मुख्यालय कहाँ है?
Ans. इसका मुख्यालय राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा में स्थित है।

Q3. 'जोहड़' क्या होता है?
Ans. जोहड़ बारिश के पानी को सहेजने के लिए बनाया गया एक पारंपरिक कच्चा बांध या तालाब होता है, जो भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करता है।

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